History of Bettiah Jangi Masjid: बेतिया शहर अपने आप में एक इतिहास है, जिस तरह भारत की आजादी का इतिहास बेतिया से जुड़ा है, उसी तरह यहां कई ऐतिहासिक धरोहरें हैं, उन्हीं में से एक है बेतिया की जंगी मस्जिद। बेतिया जंगी मस्जिद शहर के बीचोंबीच मीना बाजार में स्थित है, 115 फीट ऊंची यह मस्जिद बेतिया की शान के रूप में शहर के प्रसिद्ध स्थानों में से एक है। जंगी मस्जिद का नाम सुनकर कई लोगों को लगता है कि यह किसी युद्ध या लड़ाई से जुड़ी होगी, लेकिन हकीकत कुछ और ही है।
बेतिया जंगी मस्जिद सिर्फ ईंट और मिट्टी से बनी एक इमारत नहीं है, बल्कि यह हमारी संस्कृति, आपसी भाईचारे और इतिहास का एक हिस्सा है जो सभी को एक साथ जोड़े रखती है। तो आइए, जानते हैं इस मस्जिद की कहानी (History of Bettiah Jangi Masjid), जिसे सुनकर हर बेतिया वासी को गर्व होगा कि यह हमारी अपनी धरती है, हमारी पहचान बेतिया है। ‘जंगी’ नाम सुनते ही मन में लड़ाई-झगड़े की छवि उभरती है, लेकिन असल में इसका नाम श्री जंगी खान नामक एक बहादुर सेनापति के नाम पर रखा गया है।
कहा जाता है कि उस समय बेतिया के राजा के अधीन जंगी खाँ सेनापति थे। 1745 के आसपास जंगी खाँ और उसकी सेना इसी स्थान पर नमाज़ अदा किया करती थी। उन्होंने ठहरने और नमाज़ अदा करने के लिए इसी स्थान को चुना था, जो बाद में धीरे-धीरे यह एक मस्जिद के रूप में उभर आया। इसलिए ‘जंगी’ शब्द का अर्थ लड़ाई नहीं, बल्कि बहादुरी, नेतृत्व और सम्मान का प्रतीक है।
जंगी मस्जिद कैसे एक छोटी सी जगह से बेतिया की एकता का सबसे बड़ा केंद्र बना
शुरुआत में यह जगह नमाज़ पढ़ने के लिए एक छोटी सी जगह थी, जहाँ श्री जंगी खान की सेना के पठान सैनिक दिन भर की थकान के बाद आराम करते और नमाज़ पढ़ते थे। धीरे-धीरे इस छोटी सी जगह का न सिर्फ़ विस्तार किया गया, बल्कि इसे एक भव्य मस्जिद का रूप भी दिया गया, जो आज अपनी खूबसूरती और ऐतिहासिक महत्व के लिए पूरे बेतिया में जानी जाती है।

मस्जिद की मीनार लगभग 115 फीट ऊँची है, जो शहर की खूबसूरत तस्वीर में एक अलग ही चमक भर देती है। 2005 में बेतिया के स्थानीय लोगों ने चंदा इकट्ठा करके इस मीनार का निर्माण कराया। इस काम में भूकंपरोधी तकनीक का इस्तेमाल किया गया ताकि यह मीनार सालों तक मज़बूती से खड़ी रहे और इस मस्जिद में लगभग 900 लोग एक साथ नमाज़ अदा कर सकें, जो इसे न सिर्फ़ एक धार्मिक स्थल बनाता है, बल्कि पूरे समुदाय की एकता का एक बड़ा केंद्र भी बनाता है।
जंगी मस्जिद के मुख्य इमाम की सूची (1745 से वर्तमान तक)
क्रम (series) | इमाम का नाम (Name of Imams) | टिप्पणी/संबंध (Relation) | वर्ष (Years) |
1 | हाफ़िज़ अब्दुल रहमान | जंगी खान के समय में मस्जिद के पहले इमाम | 1745/1850 |
2 | मौलाना असगर अली | अब्दुल रहमान के बाद, अगली पीढ़ी से | 1850/1900 |
3 | हाफ़िज़ मोहम्मद गयासुद्दीन | अब्दुल रहमान के बेटे | 1900/1950 |
4 | मौलाना (Local restaurant) | समुदाय द्वारा निर्वाचित इमाम | 1950/2000 |
5 | जानकारी उपलब्ध नहीं | 2025 |
जंगी मस्जिद के पहले इमाम हाफ़िज़ अब्दुल रहमान साहब थे, जो धार्मिक शिक्षा और समाज सेवा में सक्रिय थे। उनके बाद मौलाना असगर अली और हाफ़िज़ मोहम्मद ग़यासुद्दीन साहब जैसे कई प्रतिष्ठित इमाम आए, जिन्होंने मस्जिद को सिर्फ़ नमाज़ पढ़ने की जगह नहीं, बल्कि एक सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्र बनाया।
जंगी मस्जिद का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
- मस्जिद के आसपास छोटे-छोटे कार्यक्रम और सामाजिक आयोजन होते रहते हैं।
- यह स्थान बेतिया के मुस्लिम समुदाय का हृदय स्थल है, जहाँ लोग अपने सुख-दुख साझा करते हैं।
- यहाँ ईद और अन्य त्यौहार बड़ी धूमधाम से मनाए जाते हैं।
- यह हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की भी एक मिसाल है, क्योंकि यहाँ हर समुदाय के लोग सम्मान के साथ रहते हैं।

यहाँ के लोग अपने इमाम साहब को परिवार का हिस्सा मानते हैं और किसी भी विवाद या समस्या की स्थिति में मस्जिद में सलाह-मशविरा किया जाता है ताकि लोगों को किसी भी समस्या से निजात मिल सके।
मस्जिद में विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित
जंगी मस्जिद बेतिया के मुस्लिम समुदाय के लिए सिर्फ़ एक इबादतगाह ही नहीं, बल्कि प्रमुख त्योहारों और जलसों का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी है। यहाँ हज़ारों लोग इकट्ठा होते हैं, खासकर ईद-उल-फितर और ईद-उल-अज़हा के दौरान। इन मौकों पर मस्जिद की सफ़ाई, सजावट और जश्न मनाने की ज़िम्मेदारी बुज़ुर्गों और युवाओं की होती है। रमज़ान के पवित्र महीने में, तरावीह की नमाज़ के बाद, सामूहिक इफ़्तार का आयोजन किया जाता है।
जिसमें न सिर्फ़ मुस्लिम समुदाय के लोग, बल्कि आसपास के इलाके के लोग भी शामिल होते हैं। रमज़ान के महीने में, चाहे किसी भी धर्म या संप्रदाय के लोग हों, जंगी मस्जिद के आसपास का जीवन देखने लायक होता है। इस रमज़ान के दौरान भोजन और राहत सामग्री भी उपलब्ध कराई जाती है, जो समुदाय की सहानुभूति और सहयोग का प्रतीक है।

इसके अलावा, मस्जिद नियमित रूप से बच्चों के लिए धार्मिक शिक्षा यात्राएँ भी आयोजित करती है, ताकि युवा पीढ़ी अपने धर्म और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी रहे या अपने धर्म को समझ सके। यहाँ शिक्षा निःशुल्क है, अमीर और गरीब बच्चे एक साथ पढ़ते हैं। इस प्रकार, जंगी मस्जिद न केवल धार्मिक आयोजनों का स्थान है, बल्कि बेतिया के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी है, जो दोस्ती और भाईचारे को मजबूत करता है।
आधुनिक काल में जंगी मस्जिद
- बिजली, पानी और स्वच्छता की पूरी व्यवस्था है।
- किसी भी धर्म के लोग यहाँ आ सकते हैं या रह सकते हैं।
- मीनार का निर्माण भूकंपरोधी तकनीक से किया गया है, ताकि सुरक्षा बनी रहे।
- मस्जिद की देखरेख एक समिति करती है।
- जो हमेशा साफ-सफाई और व्यवस्था का ध्यान रखता है।

आज के समय में, मस्जिद आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित है। जैसे किसी भी धर्म के लोग यहाँ आ सकते हैं, सकते हैं, यहाँ कोई रोक-टोक नहीं है। जंगी मस्जिद से पूरे बेतिया का नज़ारा दिखता है और एक खूबसूरत नज़ारा पेश करता है।
बेतिया की जंगी मस्जिद की मीनार की लंबाई और उसकी भव्यता
बेतिया शहर में कई ऐतिहासिक इमारतें हैं, लेकिन जंगी मस्जिद की मीनार अपनी ऊँचाई और भव्यता के लिए विशिष्ट है। लगभग 115 फीट ऊँची यह मीनार पूरे बेतिया में सबसे बड़ी मानी जाती है। 7 मंजिलों में फैली इस मीनार की संरचना और मजबूती देखने लायक है।
स्थानीय लोग इसे बेतिया का गौरव कहते हैं क्योंकि इसका न केवल धार्मिक महत्व है, बल्कि यह शहर के सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन का केंद्र भी है। यहाँ से ऊपर चढ़ने पर आपको बेतिया की गलियों, बाज़ारों और मैदानों का अद्भुत नज़ारा दिखाई देता है। जंगी मस्जिद की यह मीनार भी बेतिया की सबसे बड़ी मस्जिदों में गिनी जाती है, जो हर समुदाय को जोड़ने का काम करती है।

यह मीनार इतिहास और आधुनिकता का एक खूबसूरत संगम है, जो बेतिया की पहचान में एक विशेष स्थान रखती है। यह मीनार न केवल ऊँचाई में, बल्कि अपनी वास्तुकला और आधुनिक तकनीक के लिए भी खास है। इसे भूकंपरोधी तकनीक से बनाया गया है, जिसकी वजह से यह वर्षों तक मजबूती से खड़ी रहती है। हर मंजिल पर स्थित बालकनी से बेतिया का पूरा दृश्य देखा जा सकता है, जो आगंतुकों को मंत्रमुग्ध कर देता है।